सातवां चरणः यूपी की 13 सीटों पर भाजपा के लिए चुनौती, कांग्रेस की राह कठिन

लखनऊ। चुनावी समर 2019 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया। अंत भला तो सब भला की तर्ज पर सभी राजनीतिक दलों के सामने अंतिम द्वार पर अपना झंडा फहराने की चुनौती है। सीटें तो अब सिर्फ 13 ही बची हैं जिन पर फैसला होना है। लेकिन अंतिम पड़ाव की यह जंग काफी दिलचस्प हो गई है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह 2014 जैसा करिश्मा दोहराते हुए सभी 13 सीटों पर फिर कब्जा कर पाएगी या सत्ताविरोधी चरित्र वाली बलिया से घोसी तक की यह धरती इस बार कमल के लिए कुछ मुश्किलें खड़ी करेगी।
दरअसल, इन 13 सीटों के नतीजों पर नजर डालने पर गोरखपुर और उसके पास की बलिया, सलेमपुर और घोसी सीटों का चरित्र बिल्कुल अलग-अलग दिखाई देता है। खासतौर से अयोध्या आंदोलन के बाद प्रदेश के सियासी समीकरणों में जो बदलाव आया उससे भाजपा को प्रदेश में पैर पसारने का मौका मिला।
दूसरी तरफ कांग्रेस के पैर जमीन से उखड़ना शुरू हो गए। गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर, बांसगांव और वाराणसी की जमीन पर एक बार कमल खिला तो वह यहां के लोगों के दिल में बस गया। गोरखपुर में पिछले वर्ष उपचुनाव को छोड़ दें तो भाजपा लगातार आठ बार जीत चुकी है।
पड़ोस की बासगांव, महराजगंज और कुशीनगर में भाजपा का दबदबा तो है, लेकिन देवरिया, गाजीपुर, चंदौली, मिर्जापुर और राबर्ट्सगंज इलाके का रुझान एकदम अलग है। यहां के लोगों ने कभी भाजपा को गले लगाया तो कभी भाजपा से अपना गला छुड़ाया।
बलिया, घोसी और सलेमपुर में क्या फिर खिलेगा कमल?
वजह शायद सरजू पांडेय, झारखंडे राय, विश्वनाथ शास्त्री जैसे वामपंथी, चंद्रशेखर व रामनरेश कुशवाहा जैसे समाजवादी चेहरे ही रहे जो हमेशा धारा के विरुद्ध चलना पसंद करते थे। इससे पूर्वांचल की इस धरती का चरित्र मंदिर आंदोलन की बयार में भी प्रदेश के अन्य हिस्सों के खिलाफ रहा। तभी तो जिस मंदिर आंदोलन ने भाजपा को विस्तार दिया उसका कोई जादू बलिया, घोसी और सलेमपुर में नहीं दिखा।
लोकसभा के 2014 के चुनाव से पहले भाजपा यहां खाता भी नहीं खोल पाई थी। गाजीपुर सीट पर भी 1991 में भाजपा का कमल नहीं खिला था। हालांकि वर्ष 1996 और 1999 में खिला तो, लेकिन गाजीपुर वालों ने 2004 के चुनाव में भाजपा से फिर मुंह मोड़ लिया। एक दशक के अंतराल के बाद 2014 में गाजीपुर ने मनोज सिन्हा के रूप में भाजपा को जिताकर भेजा। सिर्फ गाजीपुर सीट ही 2014 में भाजपा को नहीं मिली।
मंदिर लहर में भी भाजपा को न मिलने वाली घोसी, सलेमपुर और बलिया जैसी सीटें भी मोदी लहर में भाजपा की झोली में आ गिरीं। भाजपा ने इस बार बलिया में भरत सिंह के स्थान पर भदोही से सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त को कमल खिलाने की जिम्मेदारी सौंपी है। घोसी और सलेमपुर से भाजपा ने मौजूदा सांसदों हरिनारायण राजभर और रवींद्र कुशवाहा पर ही भरोसा जताया है। देखने वाली बात यही है कि ये चेहरे इन सीटों पर इस बार भी कमल खिलाने का करिश्मा दिखा पाते हैं या नहीं।
कांग्रेस की कठिन राह
पिछले तीन दशक के सियासी सफर पर नजर डालें तो अंतिम चरण की जंग अगर किसी पार्टी के लिए सबसे कठिन रही है तो वह है कांग्रेस। प्रियंका वाड्रा के सहारे यूपी में अपनी जड़ों को फिर जमाने की कोशिश को सबसे मुश्किल चुनौती इसी चरण में कांग्रेस के सामने है।
तीन दशक पहले कांग्रेस और वामपंथी व समाजवादियों के बीच बंटने वाली इन सीटों के समीकरण आज भाजपा और सपा के बीच सिमटे हुए हैं। बसपा का साथ होने से सपा की ताकत बढ़ी है तो बसपा भी कई सीटों पर मजबूत हुई है। कभी कांग्रेस का गढ़ रहीं इन सीटों के मौजूदा समीकरणों पर कांग्रेस फिट नहीं दिख रही है। वामपंथी धारा भी लगभग सूख चुकी है।
दिलचस्प तथ्यः 1984 से अब तक
कांग्रेस – कांग्रेस का गोरखपुर, देवरिया, सलेमपुर, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, मिर्जापुर व राबर्ट्सगंज आठ सीटों पर खाता नहीं खुला।
– घोसी में 1991 के बाद कांग्रेस नहीं जीती।
84 के बाद जो सीटें एक या दो बार जीती
वाराणसी 2004, बांसगांव 1989 व 2004, कुशीनगर 2009, महराजगंज 2009
बसपाः वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, बांसगांव, गोरखपुर, महराजगंज और कुशीनगर में खाता नहीं खुला।
सपा: उप चुनाव में गोरखपुर सीट जीतने के बाद इन 13 में से कोई सीट ऐसी नहीं है जिस पर सपा या जनता दल के उम्मीदवार कभी न कभी जीते न हों।
भाजपाः 2014 में बलिया, घोसी और सलेमपुर सीटें जीतकर भाजपा इन सभी 13 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली पार्टी बन गई है।