सिनेमा में कलात्मकता के पूरक गिरीश कर्नाड नहीं रहे

मुम्बई। गिरीश कर्नाड स्वतंत्रता के बाद भारतीय रंगमंच के उन चार आधार स्तंभों में गिने जाते थे, जिनमें हिंदी के मोहन राकेश, बांग्ला के बादल सरकार और मराठी के विजय तेंदुलकर शामिल थे। परंपरागत कथानकों की आधारभूमि पर वर्तमान की दृष्टि से भविष्य का आभास कराने वाले कर्नाड स्वातंत्र्योत्तर भारतीय रंगमंच को स्थापित करने वाले पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं। 10 जून को 81 वर्ष की अवस्था में उनका बेंगलुरु में निधन हो गया। नाटक, रंगमंच, अभिनय और निर्देशन की दुनिया में अपनी बहुमुखी प्रतिभा की छाप छोड़ने वाले कर्नाड भारतीय कला-संसार का एक बड़ा हिस्सा रिक्त कर गए हैं।

गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक के मंचन का दृश्य।

महाराष्ट्र के माथेरान में 19 मई 1938 को गिरीश कर्नाड का जन्म हुआ था। उनके पिता सरकारी नौकरी में थे, इस वजह से देश के कई हिस्सों में उन्होंने अपना जीवन बिताया है। कर्नाटक के सिरसी में जब उनके पिता का ट्रांसफर हुआ था, वह अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौर में थे। उनमें एक दबी-छिपी इच्छा थी कि वह अंग्रेजी में काव्य-रचना करें और अंतरराष्ट्रीय नोबेल पुरस्कार जीत सकें। पिता और माता, दोनों ही रंगमंच के बड़े रसिक थे। ऐसे में उन पर इसका प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक था। कर्नाड को नाटककार बनाने में सिरसी की भूमिका कम न थी।
सिरसी में तब बिजली नहीं थी और बाल कर्नाड के पास मनोरंजन का कोई साधन भी न था। परिवार का धार्मिक वातावरण होने के नाते उन्हें वेद-पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथ सहज उपलब्ध थे। कहानियों में दिलचस्पी ने उन्हें पढ़ने को प्रेरित किया और बहुत ही कम समय में उन्होंने वेदों और पुराणों की कहानियां पढ़ डालीं। इसकी छाप को उनके साहित्य में स्पष्ट देखा जा सकता है जहां ययाति से लेकर अग्नि और बरखा तक में उनके कथानक महाभारत या अन्य किसी धार्मिक ग्रंथ की अनेक कहानियों के बीच दबी किसी प्राचीन लेकिन नई और वर्तमान की विषमताओं पर भूत की शिक्षाओं से प्रहार करने की शक्ति रखने वाले किरदारों के इर्द-गिर्द बुनी गई दिखती है।
तुगलक में उन्होंने एक सनकी बादशाह की विफलताओं के दृश्य से आजादी के बाद के भारत की राजनीति स्थिति को रेखांकित करने की कोशिश की है। वहीं, मानवीय महत्वाकांक्षाओं का प्रतिबिंब दिखाती उनकी कृति ययाति तथा अग्नि और बरखा से भी कर्नाड के पौराणिक आख्यानों में कल्पना का पुट मिलाकर समकालीन संदर्भ में अपनी बात कहने की प्रतिभा परिलक्षित होती है। जातिवादी समाज की रूढ़िवादी विचारधाराओं पर उनके नाटक लगातार प्रहार करते हैं।
भारतीय नाट्यशास्त्र का इतिहास बहुत पुराना है। ईसा पूर्व की सातवीं शताब्दी में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का लेखनकाल माना जाता है।हालांकि, रंगमंच की बारीकियों की बारीकी से व्याख्या करने वाले इस नाट्यशास्त्र के देश में नाटकों को लेकर पाश्चात्य शैली का प्रभाव काफी वक्त तक हावी रहा था। आजादी के बाद देश की अनेक भाषाओं में मौलिक नाटकों की रचनाओं की परंपरा शुरू हुई। ऐसे दौर में मौलिक भारतीय नाट्य साहित्य के नेता बनकर उभरे लोगों में कर्नाड भी शामिल थे।
कर्नाड के साहित्य में भारतीय संस्कृति के प्रभाव की वजह से ही उन्हें मौलिक नाटकों का नेता मानना सही नहीं है। उन्होंने अपने नाटकों में जो विषय चुने वह तत्कालीन भारतीय सामाजिक वातावरण के अनुरूप थे। कर्नाड मानते थे कि आधुनिक जीवन की विसंगतियों को भूतकाल के मिथकों द्वारा जिस तरह से समझाया जा सकता है, वैसे आधुनिक परिस्थितियों से समझाना मुश्किल है। इतिहास से वह वर्तमानबोध के लिए जमीन तैयार करते थे और फिर भविष्य की ओर देखने को प्रेरित करते थे। कोंकणी भाषा-परिवार में जन्मे कर्नाड ने ज्यादातर नाटक कन्नड़ में लिखे लेकिन उन सबका मंचन सबसे पहले हिंदी में हुआ।
केवल साहित्य ही नहीं, सिनेमा से भी कर्नाड का गहरा जुड़ाव था। कन्नड़ और हिंदी में कई फिल्मों के निर्देशन में भी उन्होंने हाथ आजमाया था। कन्नड़ सिनेमा के बड़े नाम विष्णुवर्द्धन ने कर्नाड के निर्देशन में बनी फिल्म वंशवृक्ष से अपने करियर की शुरुआत की। हिंदी सिनेमा में थिअटर की देन माने जाने वाले बेहतरीन कलाकारों अमरीश पुरी, ओम पुरी, शेखर सुमन, सोनाली कुलकर्णी और राजीव मेनन जैसे सितारे भी कर्नाड के सान्निध्य में ही सिनेमा के पर्दे पर उभरे थे।
सिनेमा, साहित्य के अलावा सामाजिक सरोकारों में भी कर्नाड बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले नागरिक थे। देश की सांस्कृतिक नीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाने वाले गिरीश कर्नाड अपनी बेबाक अभिव्यक्ति को लेकर अक्सर रूढ़िवादियों के निशाने पर रहे। कई बार उन्हें मारने की धमकियां भी मिलीं लेकिन अपने सिद्धांतों और विचारधारा को लेकर दृढ़ कर्नाड ने कभी ऐसी धमकियों से भय नहीं दिखाया। वह लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रचार करते रहे। अपने नाटकों से भी उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों में अपनी कल्पना के माध्यम से वही कहा है जो वह महसूस करते थे, जो बदलाव वह लाना चाहते थे।