शिवपाल यादव को सपा में वापस नहीं लेंगे अखिलेश, सुलह की उम्मीदें धूमिल

लखनऊ । मुलायम सिंह यादव परिवार में फिलहाल सुलह की उम्मीदें धूमिल नजर आ रही हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से चर्चाएं तेज थीं कि चाचा-भतीजे एक साथ आ सकते हैं। पर, मुलायम की तबीयत खराब होने के बाद जिस तरह का घटनाक्रम सामने आया, उससे फिलहाल एका की चर्चाएं बेदम नजर आने लगी हैं।
वैसे इसका संकेत तो सोमवार को उसी समय मिल गया था जब मुलायम सिंह का हालचाल लेने गए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री व सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के ट्वीट में शिवपाल की कोई फोटो या उनका कोई उल्लेख नहीं दिखा।
मंगलवार को यह और स्पष्ट हो गया। एक तरफ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने करीबियों को और स्पष्ट संकेत दिए कि शिवपाल सिंह यादव को पार्टी में वापस लेने की चर्चाओं में कोई दम नहीं है। दूसरी तरफ, शिवपाल की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्षों की यहां हुई बैठक में अकेले आगे बढ़ने और पार्टी को मजबूत बनाने का फैसला किया गया।
अखिलेश नहीं चाहते शिवपाल की सपा में हो इंट्री
समाजवादी पार्टी में फिलहाल शिवपाल सिंह यादव की एंट्री की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। वजह, पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव उन्हें लेकर काफी सशंकित हैं। वे नहीं चाहते कि घर-परिवार व संगठन से लेकर चुनाव आयोग तक जंग लड़कर उन्होंने पार्टी में जो वर्चस्व स्थापित किया है, उसे फिर खतरे में डाला जाए। लगातार दो लोकसभा चुनाव और एक विधानसभा चुनाव हारने के बाद अखिलेश पर परिवार को एक करने का दबाव बढ़ा है। खासकर सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव चाहते हैं कि पार्टी को खड़ा करने में योगदान देने वाले छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को दोबारा साथ लाया जाए।
सूत्रों के मुताबिक, मुलायम का कहना है कि जब धुर विरोधी कांग्रेस और बसपा से गठबंधन किया जा सकता है तो शिवपाल को साथ लेने से परहेज क्यों? पर, अखिलेश इसके लिए तैयार नहीं हैं।
अखिलेश नहीं चाहते फिर बनें सत्ता के कई केंद्र
अखिलेश के नजदीकियों का कहना है कि सपा अध्यक्ष नहीं चाहते कि पार्टी में एक बार फिर सत्ता के कई केंद्र बनें। शिवपाल के आने से इसकी संभावना कई गुना बढ़ जाएगी। बताते हैं कि कुछ व्यक्तिगत बातें भी ऐसी रही हैं कि शिवपाल को लेकर अखिलेश कड़वाहट दूर नहीं कर पा रहे हैं।
मसलन, वर्ष 2012 की जीत के बाद अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने के नेताजी के फैसले का शिवपाल ने विरोध किया था। हालांकि, नेताजी अपने फैसले पर अडिग रहे। साथ ही शुरुआती ढाई से तीन वर्ष तक वे दोनों ‘ध्रुवों’ को अच्छे से साधे भी रहे। उसके बाद पार्टी पर कब्जे की जंग चुनाव आयोग तक पहुंची, जहां से अखिलेश के पक्ष में फैसला हुआ।
सपा अध्यक्ष से सीधे जुड़े सूत्रों की मानें तो लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद मुलायम ने शिवपाल को सपा में पुनरू लाने की पुरजोर पैरवी की है। लेकिन, अखिलेश उन्हें लेने का मन नहीं बना पा रहे हैं। अखिलेश का मानना है कि चुनावी हार को तो एक न एक दिन जीत में बदल लेंगे, पर भविष्य में पार्टी के अंदर वर्चस्व की जंग दोबारा शुरू हुई तो उससे निपटना आसान नहीं होगा।
शिवपाल चुनावी लड़ाई के महारथी माने जाते हैं। किसी समय उनकी संगठन के अंदर भी मजबूत पकड़ थी, पर अखिलेश अपने ही दम पर चुनावी जंग जीतना चाहते हैं। उन्होंने इस बाबत अपने नजदीकी नेताओं को इशारा भी कर दिया है। कुल मिलाकर इस सबका नतीजा यही है कि शिवपाल के लिए फिलहाल सपा के दरवाजे बंद हैं।
प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) के जिलाध्यक्षों की मंगलवार को लखनऊ में हुई बैठक में किसी भी दल में विलय न करने और अकेले अपने दम पर आगे बढ़ने का फैसला किया गया। बैठक में पार्टी को परजीवी बनाने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा करने की रणनीति तय हुई।
जिलाध्यक्षों ने कहा कि दूसरे दलों से हाथ मिलाने या उनमें संगठन का विलय करने की चर्चाओं से नुकसान हो रहा है। ऐसी चर्चाओं पर विराम जरूरी है। कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना जरूरी है कि पार्टी का किसी भी दल में विलय नहीं किया जाएगा, जिससे लोगों में असमंजस खत्म हो।
शिवपाल ने जिलाध्यक्षों की बात पर सहमति जताई और कहा कि किसी दल में विलय का सवाल ही नहीं है। जिलों में सदस्यता अभियान चलाकर पार्टी को विस्तार दिया जाएगा। पुराने समाजवादियों को संगठन में सम्मानजनक स्थान देकर प्रदेश में भाजपा का एक मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करने पर पूरा ध्यान व ताकत लगाई जाएगी।
अखिलेश के रवैये पर नाराजगी
जानकारी के मुताबिक, बैठक में अखिलेश के रवैये को लेकर जबर्दस्त नाराजगी दिखी। कहा गया कि कुछ लोगों ने जिस तरह समाजवादी धारा की राजनीति का बंटाधार किया है, उससे समाजवादियों में काफी चिंता है।
शिवपाल ने सभी का आह्वान किया कि वे समाजवादी धारा की राजनीति को मजबूत करने में पूरी ताकत से लगें। लोगों को समझाएं कि प्रसपा ही समाजवादी धारा का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व करती है। समझा जा सकता है कि बैठक में निशाने पर सपा ही थी।
वैचारिक अभियान छेड़ेंगे
पार्टी के प्रवक्ता दीपक मिश्र ने कहा कि प्रसपा असली समाजवादी धारा की राजनीति के लिए वैचारिक अभियान छेड़ेगी। उन्होंने भरोसा जताया कि 2022 के विधानसभा चुनाव तक प्रसपा प्रदेश में एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन जाएगी। पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल व शिवकुमार बेरिया, प्रदेश अध्यक्ष सुंदरलाल लोधी और पार्टी महासचिव पूर्व सांसद वीरपाल यादव ने भी जिलाध्यक्षों को संबोधित किया।