प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए पहले भी बनती रही हैं फिल्में

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में है. दो दिन पूर्व इस फिल्म की सफलता का जश्न भी मनाया गया. इस फिल्म को लेकर कहा जा रहा है कि इसे पीएम को खुश करने के लिए ही बनाया गया.

यहाँ तक ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ से पहले भी कुछ फिल्में ऐसी आयीं जो पीएम मोदी और उनके कार्यों और योजनाओं का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करती थीं मसलन ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’, ‘सुई धागा’, ‘उरी’, ‘एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’,मेरे प्यारे प्रधानमंत्री’।. इसलिए कुछ लोग ऐसी हर फिल्म को लेकर यह कहते रहे कि ये फिल्में पीएम मोदी को खुश करने के लिए बन रही हैं.
यह पहली बार नहीं हो रहा कि प्रधानमंत्री को खुश करने या उनकी नजरों या फिर उनके करीब आने के लिए फिल्मकार फिल्म बना रहे हों. सच्चाई तो यह है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के जमाने से ऐसा होता आ रहा है.
पंडित नेहरु को समर्पित थी ‘हकीकत’

इधर यदि ध्यान से देखें तो पिछले 50 बरसों से अधिक से ऐसे कई फिल्में बनती आ रही हैं जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री की योजनाओं, उपलब्धियों और उनके कार्यों आदि की खूब सराहना की गयी या फिर प्रधानमंत्री के कहने से फिल्मकारों ने फिल्म बनायीं. इसकी बड़ी मिसाल सन 1964 में आई फिल्म ‘हकीकत; भी है. फिल्मकार चेतन आनंद द्वारा बनायी गयी यह फिल्म नेहरु युग में हुए भारत-चीन युद्द को लेकर थी. चीन ने हिंदी-चीनी भाई भाई का स्वांग रचकर भारत को धोखे में रख अचानक 1962 में भारत पर हमला बोल दिया था. इससे भारत को काफी नुक्सान हुआ और पंडित नेहरु भी इससे काफी आहत हुए थे. क्योंकि इस युद्द में भारत की पराजय से जहाँ पंडित नेहरु की विदेश नीति और सक्षमता की आलोचना होने लगी वहां इस पराजय के लिए उन्हें ही पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाने लगा था. ऐसे में चेतन आनंद ने ‘हकीकत’ बनाकर दुनिया को दिखाया कि हमारी भारतीय सेना ने अपने शौर्य से किस तरह चीनी सेना का मुकाबला किया. हमारा एक एक जाबांज सैनिक किस तरह से उनके सैंकड़ों सैनिक पर भारी पड़ा. इस तरह इस फिल्म से एक सन्देश यह भी गया कि पीएम नेहरु को ही इस पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है.
हालांकि फिल्म पूरी होने के समय एक बडी घटना यह घटी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का निधन हो गया. यह देख चेतन आनंद बहुत दुखी हुए. लेकिन उन्होंने पंडित नेहरु की अंतिम यात्रा के दृश्यों को भी अपनी फिल्म के अंत में जोड़ लिया. साथ ही फिल्म श्हकीकतश् में वे वास्तविक दृश्य भी हैं जब इस युद्ध से दो बरस पहले चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री झाऊ एनलाई ने भारत आकर भाई भाई और दोस्ती का आडम्बर रचा था और भारत में एनलाई का स्वागत गर्म जोशी से किया गया था.
उधर चेतन आनंद ने ‘हकीकत’ फिल्म के शुरू में यह लिखित घोषणा भी दी- यह फिल्म पूरी विनम्रता के साथ स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरु को समर्पित है. जो इस तरह के प्रयासों के लिए सदा प्रेरणा का स्त्रोत रहे और आज भी हैं.
शास्त्री जी के कहने पर बनी ‘उपकार’

मनोज कुमार को जिस फिल्म ने भारत कुमार बनाया और जिस फिल्म से वह निर्देशक बने वह फिल्म थी- ‘उपकार’. 1967 में आई इस फिल्म ने लोकप्रियता और सफलता के तो नए आयाम बनाए ही साथ ही देश भक्ति की फिल्मों को भी एक नयी धारा दी. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि श्उपकारश् जैसी फिल्म बनाने की सलाह मनोज कुमार को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दी थी. असल में ‘उपकार’ फिल्म शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर आधारित थी. स्वयं मनोज कुमार ने कुछ बरस पहले बताया था कि उन्होंने ‘उपकार’ को शास्त्री जी के कहने पर ही बनाया था. शास्त्रीजी ने कहा था कोई ऐसी फिल्म बनाओ जो जवानों के साथ किसानों पर भी हो.
बांग्ला देश आजाद होने पर बनी ‘जय बांग्ला देश’

सन 1971 में जब भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान को पराजित कर बांग्ला देश की स्थापना हुई, तभी फिल्मकार आई एस जौहर ने भी एक फिल्म ‘जय बांग्ला देश’ बना दी. यह फिल्म असल में पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के लिए लड़ रहे इंकलाबियों की कहानी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हीं इंकलाबियों के समर्थन में भारतीय सेना को उतारकर पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से अलग कर आजाद बांग्लादेश की स्थापना करा दी थी. हालांकि इस फिल्म में इंदिरा गाँधी या भारतीय सेना को लेकर तो कुछ नहीं दिखाया था. लेकिन जिस तरह इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को आजाद कराकर वहां के लोगों का साथ दिया था. वैसे ही आई एस जौहर ने वहां के लोगों की पीड़ा और उनके आजादी के आन्दोलन को सही ठहराकर उस पर यह फिल्म बना वहां के इंकलाबियों को भी सही ठहराया और इंदिरा गांधी को भी.
बेनेगल ने भी बनायीं ‘मंथन’ और ‘सुसमन’

जिस तरह कुछ समय पहले यशराज फिल्म्स ने अनुष्का शर्मा और वरुण धवन को लेकर फिल्म ‘सुई धागा’ बनायीं, जो पीएम मोदी के मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे अभियान पर थी. कुछ ऐसे ही फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर में फिल्म ‘मंथन’ और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर में ‘सुसमन’ को बनाया था.
1976 में प्रदर्शित ‘मंथन’ फिल्म इंदिरा युग में हुई गुजरात की दुग्ध क्रांति पर फोकस थी तो 1987 में आई ‘सुसमन’ तब के हथकरघा उद्योग के विकास को लेकर थी. ‘मंथन’ में स्मिता पाटिल, गिरीश कर्नाड, अमरीश पुरी और नसीरूदीन शाह थे तो ‘सुसमन’ में शबाना आजमी, ओम पुरी, कुलभूषण खरबंदा, मोहन अगाशे आदि थे.
मोरारजी देसाई के समय ‘नसबंदी’

जिन आईएस जौहर ने इंदिरा गांधी के बांग्ला देश आजाद कराने के कार्य को समर्थन देने के लिए ‘जय बांग्ला देश’ बनायीं. लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे तब सन 1978 में उन्हीं जौहर ने ‘नसबंदी’ फिल्म बनाकर इंदिरा गांधी का जबरदस्त विरोध किया. साथ ही उन्होंने ‘नसबंदी’ फिल्म में जनता पार्टी की तर्ज पर जनता जनार्दन पार्टी दिखाकर और जनता पार्टी के मुख्य संस्थापक जय प्रकाश नारायण की प्रशंसा में गीत भी रखा था. यह फिल्म इंदिरा गाँधी शासन के सबसे काले अध्याय आपातस्थिति और उसी दौर में देश में जबरन चले नसबंदी अभियान के विरोध में थी.
अब यह देखना दिलचस्प रहेगा की आने वाले दिनों में दर्शकों को इस तरह की और कौन कौन सी फिल्में देखने को मिलेंगी।