पहला विश्व युद्धः जर्मनी को 1 लाख टन सोने की कीमत के बराबर आर्थिक दंड चुकाने में लगे 91 साल

  • नवंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध का युद्धविराम हुआ, इसके 7 महीने बाद 28 जून 1919 को वर्साय संधि हुई ,
  • संधि में जर्मनी को युद्ध भड़काने का जिम्मेदार माना गया और उस पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए गए,
  • जर्मनी पर बड़ा आर्थिक दंड लगा, उसका 15ः क्षेत्र छीन लिया गया, सैन्य क्षमता भी सीमित कर दी गई,
  • संधि के विरोध में जर्मनी में जनाक्रोश था, इससे हिटलर और नाजीवाद के उदय में मदद मिली
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पेरिस। पहले विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर 269 अरब गोल्ड मार्क (तत्कालीन जर्मन करंसी) का आर्थिक दंड लगाया गया था। यह करीब 1 लाख टन सोने की कीमत के बराबर था। आज से ठीक 100 साल पहले 28 जून 1919 को हुई वर्साय की संधि के तहत जर्मनी पर यह आर्थिक दंड लगा था। हालांकि, इसे बाद में कई बार संशोधित कर कम किया गया, लेकिन तब भी यह इतना था कि इसे चुकाने में जर्मनी को पूरे 91 साल लग गए।
इसके साथ ही जर्मनी पर कई कड़े आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध भी लगाए गए थे। दरअसल, युद्ध में विजय हुए मित्र राष्ट्र (अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली व अन्य) ने जर्मनी को पहला विश्व युद्ध भड़काने का जिम्मेदार माना था। भविष्य में ऐसी नौबत न आए, इसलिए जर्मनी पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। हालांकि मित्र राष्ट्रों की यही सोच गलत साबित हुई और बाद में इसी संधि के कड़े प्रावधान दूसरा विश्व युद्ध छिड़ने का कारण बने।

पेरिस के वर्साय पैलेस में 28 जून 1919 का दृश्य

संधि मानने के अलावा जर्मनी के पास कोई विकल्प नहीं था
पहले विश्व युद्ध के दौरान 11 नवंबर 1918 को जर्मनी और मित्र राष्ट्रों के बीच युद्धविराम हुआ था। जनवरी 1919 में आधिकारिक रूप से युद्ध खत्म करने के लिए शांति समझौते पर बातचीत शुरू हुई। यह बातचीत केवल विजेता देशों के बीच हुई। इसमें जर्मनी और उसके सहयोगी देश आस्ट्रिया-हंगरी, तुर्की और बुल्गारिया को नहीं बुलाया गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के नेताओं ने ही इस संधि के प्रावधान तैयार किए। संधि का उद्देश्य था कि जर्मनी को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह भविष्य में किसी देश के लिए खतरा साबित न हो।
5 महीने तक चली इस बातचीत के बाद मई 1919 में जर्मनी को इस संधि के कड़े प्रावधानों के बारे में बताया गया। 17 जून को मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को संधि मानने के लिए 5 दिन का समय दिया, न मानने की स्थिति में फिर से युद्ध की धमकी दी गई। 28 जून 1919 को पेरिस के बाहरी इलाके में स्थित वर्साय महल में 240 पेज और 440 दंडनीय कानून वाली इस संधि पर जर्मन नेताओं ने हस्ताक्षर कर दिए।
37 मिनट की बैठक
संधि पर हस्ताक्षर के लिए दिन और जगह का चुनाव भी जर्मनी को अपमानित करने वाला था। संधि पर हस्ताक्षर के लिए वर्साय महल के हॉल ऑफ मिरर्स को चुना गया था। यहीं 1871 में फ्रांस की हार पर जर्मन साम्राज्य की घोषणा की गई थी। वहीं तारीख 28 जून इसलिए चुनी गई, क्योंकि इसी दिन 1914 में ऑस्ट्रिया के राजकुमार फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या हुई थी, जिसके बाद प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ था। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, 28 जून के दिन यह इवेंट महज 37 मिनट चला। इसमें 32 देशों के 27 प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए थे।
जर्मनी से छीन लिया गया था उसका 15% क्षेत्र
वर्साय की संधि ने यूरोप का नक्शा पूरी तरह से बदल दिया था। जर्मनी को अपना करीब 15% क्षेत्र खोना पड़ा था। इस क्षेत्र में जर्मनी की कुल जनसंख्या के 10% लोग रहते थे। संधि के तहत, जर्मनी के अलसेक और लॉरेन क्षेत्र फ्रांस को दे दिए गए। बर्लिन की दीवार बनाकर जर्मनी को पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में बांट दिया गया। पोलैंड को अलग देश बनाया गया। इसी तरह फिनलैंड, लिथुनिया, लातविया और चेकोस्लोवाकिया को भी जर्मनी के नियंत्रण से आजाद कर दिया गया।
ऑस्ट्रिया और हंगरी के एक बड़े हिस्से को अलग कर यूगोस्लाविया बना दिया गया। संधि ने जर्मनी की सैन्य क्षमता को भी सीमित कर दिया। इसके मुताबिक, जर्मनी 1 लाख से ज्यादा सैनिक नहीं रख सकता था। उसकी एयरफोर्स पर पूरी तरह बैन था। नेवी से बड़े जहाज छीन लिए गए और 36 छोटे जहाजों तक सीमित कर दिया गया। नेवी का पनडुब्बी रखना प्रतिबंधित था। मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी और ऑस्ट्रिया के गठबंधन पर भी बैन लगा दिया था।
पूरा जर्मनी संधि के विरोध में था, हिटलर ने इसे ही हथियार बनाया
जर्मनी के लोगों के लिए यह संधि एक अपमान की तरह थी। संधि के कठोर प्रावधानों से लोग गुस्सा थे। भारी-भरकम आर्थिक दंड की किश्तों ने देश का औद्योगिक उत्पादन घटा दिया। एक साल के अंदर ही जर्मनी में महंगाई दर बेलगाम हो गई। देश में मंदी का दौर आया और जर्मनी आर्थिक रूप से अस्थिर हो गया। जर्मन नागरिक इस पूरी स्थिति के लिए वर्साय की संधि को दोष देते थे। पहले विश्व युद्ध में सैनिक रहे एडोल्फ हिटलर ने इसी बात को भुनाया और अपनी पार्टी बनाई। हिटलर और उनकी पार्टी वर्साय की संधि के विरोधी थे।
हिटलर अपने भाषणों में जर्मनी की बिगड़ती हालत के लिए वर्साय की संधि को जिम्मेदार ठहराता था। जर्मनी पर यह संधि थोपने के लिए वह मित्र राष्ट्रों के गठबंधन को दोष देता था और साथ ही जर्मन सरकार के प्रतिनिधियों को भी जिन्होंने इस संधि पर हस्ताक्षर किए। 1933 में सत्ता में आने के बाद हिटलर ने इस संधि को मानने से इनकार कर दिया।
जर्मनी को आर्थिक दंड चुकाने में लगे 91 साल
वर्साय की संधि के तहत लगे आर्थिक दंड को चुकाने में जर्मनी को 91 साल लगे। जर्मनी ने इस दंड की आखिरी किश्त 2 अक्टूबर 2010 को चुकाई। संधि के तहत जर्मनी पर पहले 269 अरब गोल्ड मार्क आर्थिक दंड लगा था, जिसे 1929 में घटाकर 112 अरब गोल्ड मार्क (42 हजार टन सोने की कीमत के बराबर) कर दिया गया। वैश्विक आर्थिक संकट के चलते 1931 में जर्मनी को सालाना किश्त चुकाने में राहत दी गई लेकिन जब 1933 में हिटलर को सत्ता मिली तो उसने आर्थिक दंड चुकाने से साफ इनकार कर दिया।
20 साल बाद बकाया भुगतान चुकाने के लिए 1953 में लंदन में एक नया समझौता हुआ, जिसके तहत पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एक होने तक कुछ भुगतानों को सस्पेंड कर दिया गया। इस दौरान बाकी भुगतान पश्चिमी जर्मनी भर रहा था। 1990 में जब जर्मनी फिर एक हुआ, तो बकाया भुगतान चुकाना शुरू हुआ। हालांकि 1990 में जर्मनी पर बकाया भुगतान का कुछ अंश और माफ कर दिया गया।