नेशनल डॉक्टर्स डेः मानवता की सेवा के लिए इन्हें कीजिए प्रणाम

भारत के महान चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र रॉय के चिकित्सा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी जयंती व पुण्यतिथि दिवस 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाने की परंपरा है. उन्हें 1961 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ भी मिल चुका है. वास्तव में इस परंपरा की शुरुआत उन लोगों को सम्मान देने के लिए हुई थी, जो निःस्वार्थ भाव से लोगों का जीवन बचाने के लिए सेवा कर रहे हैं और उनके लिए भी, जो अपने उत्कृष्ट कार्यों से चिकित्सीय पेशे का सम्मान बढ़ा रहे हैं.
आज इस अवसर पर हम मानवता की सेवा से जुड़े कुछ ऐसे कर्मयोगियों के बारे में जानते हैं, जिनमें कुछ की प्रसिद्धि देश-विदेशों में है, तो कुछ लाइमलाइट से दूर चुपचाप उस हिपोक्रेटिक ओथ (मरीज की जान बचाने की शपथ) के लिए जी रहे हैं, जिसे इस पेशे में आते वक्त लिया था और इसे अपनी जिंदगी का मूल मंत्र भी बनाया.
डॉ प्रकाश बाबा आमटे

जनरल सर्जरी में एमबीबीस, डॉ आमटे एक डॉक्टर होने के साथ एक समाज सेवक भी हैं. डॉ आमटे महाराष्ट्र के नक्सल इलाकों में घने जंगलों के बीच रहकर आदिवासियों को मेडिकल ट्रीटमेंट के साथ एजुकेशन भी देते हैं. आमटे दंपती (पत्नी डॉ मंदाकिनी आमटे) 1973 से महाराष्ट्र के गडचिरोली जिले के हिमालकासा आदिवासी इलाके में निःस्वार्थ चिकित्सीय सेवा प्रदान कर रहे हैं. डॉ आमटे लोक बिरादरी प्रकल्प के प्रमुख हैं, जिसकी स्थापना उनके पिता बाबा आमटे ने की थी. उन्होंने कुष्ठरोगियों के लिए भी कई उल्लेखनीय कार्य किये हैं.
उन्हें जानवरों से भी अत्यंत प्रेम है, इसलिए उन्होंने अपने ही घर के पिछवाड़े में शेर, भालू, तेंदुआ, सांप, मगरमच्छ आदि साठ से अधिक वन्यजीवों का श्एनिमल आर्कश् बना रखा है, क्योंकि आदिवासी बहुल इलाका होने के कारण कई बार ये बेजुबान पशु आदिवासियों के प्रहार से घायल हो जाते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है. जानवरों के साथ उनका एक अलग ही दोस्ताना है. अपने विशिष्ट कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2008 में रेमन मैग्सेसे और 2012 में पद्मश्री की उपाधि भी मिल चुकी है. 2014 में आयी मराठी फिल्म श्द रियल हीरोश् आमटे के जीवन पर ही आधारित थी.
डॉ अभय बंग व रानी बंग

आज जहां डॉक्टरी पेशे को पैसा बनाने की मशीन के रूप में देखा जाता है, वहीं डॉ अभय (फिजिशियन) व रानी बंग (गाइनेकॉलोजिस्ट) जैसे लोग भी हैं, जो आराम और विलासिता का जीवन त्याग 20 वर्षों से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब मरीजों की दिल से सेवा कर रहे हैं. फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का वह दृश्य याद कीजिए, जिसमें डॉ रुस्ताना (बोमन ईरानी) अपने छात्रों को कहते हैं- श्एक अच्छा डॉक्टर कभी भी अपने मरीज के साथ सहानुभूति नहीं रखता, क्योंकि लगाव एक डॉक्टर को कमजोर कर सकता है.श्
इस सिद्धांत को इस डॉक्टर दंपती ने झूठा साबित कर दिया. नागपुर यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर दोनों ने पब्लिक हेल्थ के लिए काम करने का निश्चय किया. आज वे महाराष्ट्र के अत्यंत पिछड़े गढ़चिरौली जिले में कार्यरत हैं, जिसे आदिवासियों का जिला कहा जाता है. आदिवासियों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से मजबूत करना ही इनका उद्देश्य है. 1986 में SEARCH (सोसाइटी फॉर एजुकेशन एक्शन एंड रिसर्च इन कम्युनिटी हेल्थ) नाम संस्था शुरू की है, जिसका उद्देश्य मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करना है. युवाओं को शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार से जोड़ने के लिए 2006 में NIRMAN की भी नींव रखी.
साथ ही HBNC अर्थात् होम बेस्ड न्यूबोर्न केयर प्रोग्राम के तहत गांव की महिलाओं द्वारा गर्भवती महिलाओं के उचित देखभाल की जानकारी दी जाती है, ताकि नवजात और मां दोनों स्वस्थ रह सकें. इसके तहत काम करने वाली महिलाओं को अरोग्यदूत अर्थात श्हेल्थ वॉरियरश् कहा जाता है. अपने इन्हीं प्रयासों के लिए डॉ अभय और रानी बंग को पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है. आज भी ये पूरी निष्ठा के साथ अपना दायित्व निभा रहे हैं.
डॉ देवी प्रसाद शेट्टी

भारत में निओनेटल ओपन हार्ट सर्जरी करने वाले पहले हार्ट सर्जन हैं डॉ शेट्टी, जो 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का ऑपरेशन निरूशुल्क करते हैं. उनके ऑपरेशन का बड़ा हिस्सा बच्चों का ही होता है. उन्होंने देशभर में 30 से ज्यादा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल नारायण हृदयालय की स्थापना की.
इन्हें यशस्विनी स्वास्थ्य बीमा योजना का जनक भी कहा जाता है, जिसके तहत कर्नाटक सरकार कम खर्च पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती हैं. डॉ शेट्टी के जीवन में 1984 का वह समय अविस्मरणीय रहा, जब मानवता की देवी खुद मदर टेरेसा ने उनके कार्यों की सराहना की. तब मदर को दिल का दौरा पड़ा था और कोलकाता के बीएम बिड़ला हार्ट हॉस्पिटल में उनके इलाज के लिए डॉ शेट्टी को बुलाया गया. डॉ शेट्टी के शब्दों में- श्जब मदर अस्पताल में भर्ती थीं, तब वहां कई और बाल हृदय रोगी भी भर्ती थे.
एक दिन मदर मेरे साथ बच्चों से मिलने गयीं, तो उन्होंने कहा- मुझे पता है कि तुम यहां क्यों होश्. मैंने पूछा- ‘क्यों मां’? जवाब दिया- जब भगवान ने इन बच्चों को हृदय रोग के साथ बनाया, तभी तुम्हें चुन लिया था और आज उनके इलाज के लिए यहां भेजा. यह बात मेरे दिल को छू गयी.
मदर का दृढ़ता से मानना था कि प्यार सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिससे पूरी दुनिया को जीता जा सकता है. मदर की यही बात मेरे पीछे प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करती है. वॉल स्ट्रीट ऑफ जनरल द्वारा डॉ शेट्टी को ‘हेनरी फोर्ड ऑफ हर्ट सर्जरी’ की उपाधि प्राप्त है. साथ ही इन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और कर्नाटक रत्न की उपाधि भी मिल चुकी है. वाकई डॉ शेट्टी ने डॉक्टर की डिग्री पाने पर ली जानी वाली हिपोक्रेटिक ओथ (मरीज की जान बचाने की शपथ) को न सिर्फ जिया है, बल्कि अपनी जिंदगी का मूलमंत्र भी बनाया है.
डाॅ. रवींद्र कोहले और डॉ स्मिता कोहले

चिकित्सा क्षेत्र में जहां डॉक्टर्स लाखों की फीस लेते हैं, वहीं डॉ रवींद्र कोहले मरीजों से केवल एक रुपया लेते हैं. मुंबई में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर इन्होंने महाराष्ट्र के सुदूर मेलघाट के बैरागढ़ गांव में छह माह यह अध्ययन के लिए बिताया कि यहां के वंचित लोगों की मदद कैसे की जाये.
इस मुहिम में उन्हें साथी स्मिता कोहले के रूप में उन्हें मिली, जो आगे जीवन संगिनी बनीं. दोनों ने गांव में हेल्थ कैंप बनाया और ग्रामीणों के स्वास्थ्य सुधार पर काम करना शुरू किया. आज इस दंपती ने बैरागढ़ के लोगों की जिंदगी बदल दी है. इनके प्रयासों से लोगों को बिजली, सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी उपलब्ध कराये गये हैं.
स्वास्थ्य जागरूकता, कुपोषण को मिशन के रूप में बढ़ा रहे हैं. इन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भी अपने हाथों लिया, जिससे फायदा हुआ कि बरसात में जब खेती का काम नहीं होता, तो किसान को भोजन मिल जाता है. अब मेलघाट में कोई किसान आत्महत्या नहीं करता. इन्हें पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है.
डॉ गोपी नल्लयन और डॉ हेमप्रिया नाटेसन

डॉ गोपी कार्डियक सर्जन हैं और उनकी पत्नी डॉ हेमप्रिया ने सरकारी अस्पताल की अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ कर एक फाउंडेशन की स्थापना की. उद्देश्य था- कंजेनाइटल हार्ट डिसीज ( CHD ) जैसी गंभीर एवं जानलेवा बीमारी से पीड़ित वंचित वर्ग के बच्चों का मुफ्त इलाज करना.
आज पति-पत्नी दक्षिणी तमिलनाडु के शहरों एवं गांवों में घूम-घूम कर हेल्थ कैंप लगाते हैं, जिनमें लोगों का इलाज करने के साथ ही उन्हें CHD के बारे में अवेयर करते हैं. गरीब मरीजों की आर्थिक मदद भी करते हैं.
अब तक ये 15 वर्ष की आयु तक 500 से ज्यादा बच्चों की स्क्रीनिंग कर चुके हैं, जो इस बीमारी से ग्रसित हैं. 20 ऐसे बच्चों का निशुल्क सफल ऑपरेशन भी कर चुके हैं. डॉ हेमप्रिया कहती हैं- सरकारी नौकरी छोड़ कर बगैर किसी नियमित आय स्रोत के रहने का निर्णय लेना पूरी तरह से जीवन को बदल देनेवाला था, लेकिन हमने पाया कि हमारे पास आनेवाले ज्यादातर लोग पैसों की कमी के कारण ऑपरेशन करवाने से मना कर देते हैं. हमें यह बात विचलित करती थी. हम बड़े शहर में रह कर पैसे तो कमा रहे थे, लेकिन संतुष्टि नहीं मिल रही थी. तब हमने यह कदम उठाया.
डॉ एक्यूनाज इडेसरी
61 वर्ष की उम्र में डॉ एक्यूनाज इडेसरी भी आम लोगों की तरह रिटायरमेंट लेकर आराम की जिंदगी बिता सकती थीं, मगर उन्होंने ओडिशा के कालाहांडी जिले के थुआमल रामपुर ब्लॉक में सुदूर जंगलों में रहनेवाले आदिवासियों के लिए काम करने का निर्णय लिया.
जहां आज भी सड़क सुविधा उपलब्ध नहीं है, जाने-आने के लिए जीप ही एकमात्र साधन है. अन्य आधारभूत सुविधाओं का भी यहां घोर अभाव है. ऊपर से स्थानीय आदिवासियों पर भरोसा हासिल करना भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि वे केवल स्थानीय भाषा की समझते हैं. इन्हीं वजहों से जिन लोगों का इस इलाके में ट्रांसफर होता है, वे इसे अपने लिए सजा समझते हैं.
लेकिन इन्हीं कारणों ने डॉ एक्यूनाज को इस इलाके में काम करने के लिए प्रेरित किया.अपने दो अन्य साथियों के साथ मिल कर डॉ एक्यूनाज ने ‘स्वस्थ समाज’ नामक एक एनजीओ शुरू किया और इलाके में दो मेडिकल सेंटर स्थापित किये, जिनमें चैबीसों घंटे उच्च गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं तथा रोगों की आरंभिक जांच के लिए एक प्रयोगशाला उपलब्ध हैं. अपने इस छोटे-से क्लिनिक में डॉ एक्यूनाज हर दिन करीब 200 मरीजों का इलाज करती हैं.
यही नहीं, जब भी जरूरत पड़ती है, वह अपने सहयोगियों के साथ जीप से दूरस्थ क्षेत्रों में जाकर भी गरीब आदिवासियों का इलाज करती हैं, जो किसी वजह से आने में असमर्थ हैं या आदिम समुदाय से संबंध रखते हों. वे लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में यकीन करती हैं, ताकि वे खुद की बेहतर देखभाल कर सकें. साथ ही वक्त निकाल कर लोगों को, खास कर महिलाओं को आधारभूत स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां भी देती रहती हैं.
डॉ जयश्री मोंडकर

चिकित्सीय सेवा के साथ डॉ जयश्री समय निकालकर मां बनने वाली स्त्रियों के शिशुओं के लिए मिल्क बैंक संचालित करती हैं, ताकि जिन माताओं को पर्याप्त दूध नहीं होता, उनके शिशु मां के दूध से वंचित न हों.
इन्हें एशिया का पहला ‘मानव दूध बैंक’ संचालित करने का श्रेय जाता है. लोकमान्य तिलक म्यूनिसिपल जेनरल हॉस्पिटल (सियोन हॉस्पिटल) मुंबई में इस बैंक की नींव वर्ष 1989 में डॉ अर्मिदा फर्नांडिज द्वारा रखी गयी थी और आज यह बैंक जयश्री मोंडकर द्वारा चलाया जा रहा है. वर्तमान में इस बैंक में लगभग 40 वैसी महिलाएं शामिल हैं, जो अभी अपने बच्चों को स्तनपान करवा रही हैं.
इस बैंक द्वारा हर साल लगभग 1200-1400 लीटर दूध इकट्टा किया जाता है, जिससे करीब 6000 शिशुओं को लाभ मिलता है. यह दूध वैसे शिशुओं को दिया जाता है, जो कमजोर होते हैं और स्तनपान करने में सक्षम नहीं होते. यह स्कीम वैसी महिलाओं के लिए भी वरदान है, जो किसी कारण अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करवा पातीं. इस तरह जयश्री मोंडकर चिकित्सा के क्षेत्र में रहकर मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को बखूबी निभा रही हैं, जो वाकई प्रेरणादायक है.
प्रमुख तथ्य
भारत में हेल्थ केयर मार्केट वर्ष 2022 तक 8.6 खरब तक पहुंच जायेगा.
केपीएमजी के रिपोर्ट के अनुसार 80ः दवाखाना, 60ः अस्पताल और 80ः चिकित्सक भारत के शहरी क्षेत्रों में हैं, जो महज 28ः हमारी आबादी को सेवा मुहैया करा रहे हैं.
एनएचपी (नेशनल हेल्थ प्रोफाइल) की रिपोर्ट के अनुसार 33ः सरकारी चिकित्सक ही ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जहां हमारी 70 फीसदी आबादी रहती है.
भारत में स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के लिए सरकार द्वारा 23 सितंबर, 2018 को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की गयी थी, जिसका उद्देश्य प्रति वर्ष 10 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करना है.
सरकार ने 2014 में मिशन इंद्रधनुष की भी शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य वर्ष 2020 तक सभी बच्चों को टीकाकरण प्रदान करना है.
भारत में डॉक्टर और मरीज का अनुपात 1ः1000 है. यानी प्रति डॉक्टर, 1000 मरीज हैं.