संसाधनों पर बोझ बनती जा रही है आबादी

  • चन्द्रकान्त त्रिपाठी

बढ़ती आबादी सीमित संसाधनों पर बोझ बनती जा रही है। आबादी में हर साल लगभग 80 लाख की दर से बढ़ोतरी हो रही है। खाद्य संकट गहराने में बढ़ती आबादी की भूमिका जगजाहिर है। आज पर्यावरण प्रदूषण से प्राकृतिक संसाधन खत्म होने के कगार पर हैं। वह चाहे भूजल हो, नदी जल हो, वायु हो, सभी भयावह स्तर तक प्रदूषित हैं। हरित संपदा सड़क, रेल, कल-कारखानों की भेंट चढ़ रहे हैं। झील, तालाब, बावड़ी, कुंए, पोखर का अतिक्रमण के चलते उनका नामोनिशान मिटता जा रहा है। कृषि योग्य भूमि आवासीय जरूरतों की पूर्ति हेतु दिनोंदिन घटती ही जा रही है।
प्रबल आशंका है कि तापमान में बढ़ोतरी अपने चरम पर जा पहुंचेगी, नतीजतन ध्रुवों की बर्फ जो पहले ही से तेजी से पिघल रही है, अंततः पिघल जायेगी और समुद्र का जलस्तर बढ़ जायेगा। इससे एक करोड़ प्रजातियों में तकरीबन 20 लाख प्रजातियां लुप्त हो जायेंगी।
आने वाले आठ सालों यानी 2027 में भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जायेगा। देश में जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों का दुखद परिणाम ही कहा जायेगा। वर्ष 2050 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले चीन की जनसंख्या भारत की आबादी का केवल 65 फीसदी रह जायेगी।
रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक जिन नौ देशों में दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी की बढ़ोतरी होगी, उनमें भारत शीर्ष पर है। उस सूची में भारत के बाद नाइजीरिया, पाकिस्तान, डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन ऑफ कांगो, इथियोपिया, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिस्र और अमेरिका है। इन देशों को बूढ़ी होती आबादी की चुनौतियों से भी जूझना होगा। यहां गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, असमानता, शिक्षा और स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती है। भारत भुखमरी सूचकांक में दुनिया के 119 देशों में 103वें स्थान पर है।
इसमें दो राय नहीं कि भारत की बहुतेरी समस्याओं की जड़ में आबादी है। हमारे यहां जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को नाकाम करने में जाति-धर्म के नाम पर रोटी सेंकने वाले स्वयंभू ठेकेदारों और राजनैतिक दलों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में एक कानून का अभाव हमारे राजनीतिक नेतृत्व की विफलता का सबूत है।
वोट बैंक की राजनीति सरकारों को कठिन निर्णय लेने से रोकती रही है। अब समय आ गया है कि हम इस मामले में चीन से सबक लें। जनसंख्या नियंत्रण की प्रभावी नीति के बिना वह चाहे रोजगार मुहैया कराने का सवाल हो, भोजन, आवास, चिकित्सा, शिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा, जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का सवाल हो या फिर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा-सुरक्षा का सवाल हो, पर्यावरण, प्रदूषण, आवागमन, सिंचाई, पेयजल, संचार या विज्ञान, तकनीक या फिर विकास आदि अन्य सवाल हों, निपटना आसान नहीं है। जनसंख्या वृद्धि अब नासूर का रूप अख्तियार कर चुकी है, इसलिए इसका इलाज बेहद जरूरी है।
यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग की चेतावनी आनेवाले दिनों में सही साबित होगी कि पृथ्वी पर टिके रहने में हमारी प्रजाति का कोई दीर्घकालिक भविष्य नहीं है। यदि मनुष्य बचे रहना चाहता है, तो उसे 200 से 500 साल के अंदर पृथ्वी को छोड़कर अंतरिक्ष में नया ठिकाना खोज लेना होगा। तभी कुछ बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सकती है अन्यथा नहीं।

2 Comments

  1. खालिस आबादी की बात ना करना आज के संदर्भ में बेमानी है।सही मायनों में डेमोक्रेसी तार तार होचुकी है।अब चीन की तरह की सरकार ही शायद बचा पाए।बहराल इस संबंध में कानून की सख्त जरूरत है।

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