देवोत्थानी एकादशी 8 नवम्बर को

जगत पिता ब्रह्माजी बोले-नारद! अब मैं पुण्य और भक्ति प्रदान करने वाली प्रबोधिनी एकादशी की कथा कहता हूँ। भागीरथी गंगा मनुष्य को तभी तक फल देने वाली है, जब तक कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष को देवोत्थानी एकादशी नहीं होती है। नारदजी ने पूछा-हे जगत पिता! एक सन्ध्या को भोजन करने, रात्रि में भोजन करने और पूरे दिन उपवास करने से क्या फल प्राप्त होता है उसे आप विधिवत् समझाइये।

ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! एक सन्ध्या को भोजन करने में एक जन्म के तथा रात्रि में भोजन करने से दो जन्म के और पूरे दिन उपवास करने से सात जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। जिस वस्तु का त्रैलोक्य में मिलना असम्भव है वह वस्तु देवोत्थानी एकादशी के व्रत से मिल जाती है। देवोत्थानी एकादशी के प्रभाव से सुमेरू पर्वत के समान पाप भी नड्ढ हो जाते हैं। हे नारद जी! जो कोई श्रद्धापूर्वक थोड़ा भी पुण्य करते हैं, वह पुण्य उनका पर्वत के समान अटल हो जाता है। जो मनुष्य देवोत्थानी एकादशीके व्रत में रात को जागरण करते हैं, उनको पूर्व की कथा आगे आने वाली दस हजार पीढि़याँ विष्णुलोक में निवास करती हैं और नर्कलोक में कड्ढ भोगते हुए पितृगण स्वर्ग में जाकर सुख भोगते हैं। ब्रह्महत्या आदि महान पाप भी इस प्रबोधिनी एकादशी के प्रभाव से नड्ढ हो जाते हैं। रात्रि जागरण का फल अश्वमेघ यज्ञों आदि के फलों से तथा भूमि, स्वर्ग, गौर आदि दान का फल इस प्रबोधिनी देवोत्थानी एकादशी के रात्रि जागरण के फल के समान है।इस लोक में उसी मनुष्य का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधनी एकादशी के व्रत के द्वारा अपने कुल को पवित्र किया है। इस लोक में जितने भी तीर्थ हैं वे देवोत्थानी एकादशी का व्रत करने वाले के घर में वास करते हैं! मनुष्य को समस्थ कर्मों का त्याग करके ईश्वर की प्रसन्नता के लिए इस कार्तिक मास की एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिये। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता है तथा कातिक, वाचिक, मानसिक पापों का नाश हो जाता है।

प्रबोधिनी एकादशी के दिन के जागरण करने का फल सूर्य, चन्द्र के ग्रहण में गंगा स्नाना करने के फस से सहस्र गुना है जो पुण्य मनुष्य जन्म लेकर करता है वह समस्त पुण्य इस प्रबोधिनी एकादशी के व्रत के आगे व्यर्थ हैं, और जो मनुष्य एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, उनके भी समस्त पुण्य व्यर्थ हैं। अतः हे नारदजी! तुम्हें भी विधि पूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये जो कोई मनुष्य कार्तिक मास में धर्मपरायण होकर अन्य व्यक्तियों का अन्ना नहीं खाते, उनको चाँदायण व्रत का फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास में जो मनुष्य भगवत कथा को थोड़ा या अधिक सुनते व पढ़ते तथा सुनाते हैं, उनको सौ गौ के दान का फल मिलता है। जो लोगप्रबोधिनी एकादशी के दिन विष्णु की कथा सुनते हैं उन्हें सातों द्वीपों के दान का फल प्राप्त होता है ताकि वे उत्तम लोक को प्राप्त होते हैं। इतनी सुनकर नारदजी ने पूछा-हे जगत पिता! अब आप एकादशी के व्रत का विधान कहिये। ब्रह्माजी ने कहा-हे नारदजी! एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिये और नदी, तलाब व कुआँ आदि पर स्नान करे व्रत का नियम लेना चाहिये, व्रत नियम धारण करते समय कहना चाहिये कि हे प्रभु! आज मैं निराहार रहकर दूसरे दिन अन्ना का भोजन करूँगा। हे जगदीश्वर! आप मेरी रक्षा करो। इस प्रकार प्रभु की विनय करने के पश्चात् ही पूजा करके व्रत को प्रारम्भ करके रात्रि जागरण करना चाहिये और भोजन, कीर्तन, गीत गाकर कथा, बाजे,नृत्य आदि से सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत करनी चाहिये। इस एकादशी के दिन कंजूसी को त्यागकर पुष्प, फल, धूप तथा धूपबत्ती से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये। शंख के जल से श्री विष्णु को अर्घ्य देना चाहिये। जो कोई मनुष्य भगवान की पूजा कमल पुष्प से करते हैं उनके सन्मुख देव भी हाथ जोड़ उपस्थित खड़े रहते हैं। जो मनुष्य कार्तिक मास में विल्व पत्र से श्रीहारि की पूजा करते हैं उन्हें अन्त समय पर मुक्तिप्राप्त होती है। जो मनुष्य तुलसीदल द्वारा कार्तिक मास में श्री विष्णु की पूजा करते हैं, उनके जन्म के समस्त पापों का नाश हो जाता है। जो मनुष्य कार्तिक मास में नित्य प्रति श्री तुलसी जी के दर्शन या स्मरण अथवा छूते हैं या रोपण करते हैं या हरिकथा कीर्तन करते हैं अथवा सेवा करते हैं, वे मनुष्य हजार कोटि युग तक स्वर्ग में निवास करते हैं। जो कार्तिक मास में तुलसी जी का वृक्ष लगाते हैं, उनके कुटुम्ब में पैदा होने वाले मनुष्य प्रलय काल के अन्त तक विष्णु लोक में वास करते हैं। जो मनुष्य कदम्ब के पुष्प से विष्णु की पूजा करते हैं, वे लोग यमराज की यातनाओं को नहीं भोगते हैं और जो मनुष्य गुलाब के पुष्प से श्रीहरि की पूजा करते हैं, उनको मुक्ति का लाभ होता है और अशोक तथा बकुल के पुष्पों से भगवान की पूजा करने पर अनन्त काल तक वह पूजा करने वाला शोक से मुक्त रहता है। सफेद और लाल कनेर से विष्णुभगवान की पूजा करने पर विष्णु सदा प्रसन्न रहते हैं। जो मनुष्य कार्तिक मास में भगवान विष्णु की पूजा पूर्वादल से करते हैं, वे पुरुष पूजा के फल से भी सौ गुना फल प्राप्त करते हैं और शमी पत्र से भगवान की पूजा करने वाले मनुष्य सरलता से यमराज के भयानक मार्ग को पार करजाते हैं और आवागमन में छूट जाते हैं, जो श्रीहरि की पूजा चम्पक पुष्प से करते हैं अथवा स्वर्ग व केतकी पुष्प श्रीहरि पर चढ़ाने वाले मनुष्यों के करोड़ों जन्म के पाप नड्ढ हो जाते हैं। श्वेत दीप में जन्म लेने वाले मनुष्य को पीले या रक्त वर्ण के कमल पुष्पों से श्रीहरि की पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन करा दक्षिणा दे तदुपरान्त भोजन, गौ आदि दक्षिणा से गुरू पूजा करनी चाहिए। जो मनुष्य स्नान करते हैं उन सब को दही तथा शहद का दान करना चाहिये। जो मनुष्य फल की आशा करते हों उन्हें फल का दान करना चाहिए तथा तेल के स्थान पर व्रत के स्थान पर दूध तथ अन्न व चावलों का दान करना चाहिये जो मनुष्य इस व्रत में भूमि पर सोते हैं उनको व्रत की समाप्ति पर शैयादान करनी चाहिए और इस व्रत में मौन धारण करने वाले को तिलों का दान करना चाहिए , जो बालों को धारण करने वाले हो उन्हें दर्पण का दान करना चाहिये तथा जो मनुष्य, नमक त्यागने वाले को शक्कर का दान करना चाहिए, जो मनुष्य देव मन्दिर में नित्य प्रति दीप जलाते हैं, उनको तामृ या स्वर्ण के दीपक में घी बत्ती डालकर दान करना चाहिए। जिस मनुष्य ने चातुर्यमास्य व्रत में जिस वस्तु को त्याग दिया हो उसे दान कर फिर से उस वस्तु का सेवन करना चाहिए। जो मनुष्य देवोत्थानी एकादशी के दिन विधि पूर्वक श्रद्धा और भक्ति के साथ व्रत करते हैं उन्हे अनन्त सुख मिलता है और वे लोग स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। 

-ज्योतिर्विद् गगन भारद्वाज आत्मज पं. राजेगुरु जी ज्योतिषाचार्य