नोटबंदी के तीन सालः नहीं उबर सका आगरा में जूता कारोबार

आगरा। तीन साल पहले आठ नवंबर को की गई नोटबंदी ने ताजनगरी के जूता उद्योग को जो चोट पहुंचाई, उससे जूते का कुटीर उद्योग अब तक उबर नहीं पाया है। जूता कारोबार में नकदी का चक्र घूम नहीं रहा, वहीं जीएसटी ने कोढ़ में खाज का काम किया।

नोटबंदी से परेशान व्यापारियों को जीएसटी में टैक्स दरों और रिफंड की मुश्किलों ने उलझा दिया। घरेलू जूता कारोबार तीन साल बाद भी पटरी पर नहीं लौट पाया है। शहर में आठ हजार से ज्यादा छोटी इकाइयां जूते के निर्माण में लगी हैं जो देश में जूते की जरूरतों को 65 फीसदी पूरा करती हैं।

तीन साल पहले 8 नवंबर को जब 500 और एक हजार रुपये के नोट चलन से बंद किए गए तो दो माह तक शहर की 50 फीसदी घरेलू जूता निर्माण इकाइयां बंद रही थीं। कारखानेदारों के मुताबिक नोटबंदी से लगे झटकों से अब तक वो उबर नहीं पाए हैं।

आगरा जूता दस्तकार एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेंद्र सोनी ने बताया कि नोटबंदी का फायदा सरकार को तो हुआ नहीं, हमें जबरदस्त नुकसान हो गया। यह पूरा बाजार उधारी पर चलता है। नकदी का संकट जैसा अब है, पहले कभी नहीं था। नोटबंदी से हमारी कमर टूट गई।

जूता दस्तकार फेडरेशन के अध्यक्ष भरत सिंह का कहना है कि नोटबंदी के बाद जो नियम लागू किए गए, उससे नकदी का संकट खड़ा हो गया। डिजिटल पेमेंट और नकदी की सीमा तय करने का नुकसान हमें ज्यादा हुआ है।