गोपाल विशारदः मृत्यु के 33 साल बाद मिला रामलला की पूजा का अधिकार

नई दिल्ली। अयोध्या में राममंदिर-बाबरी मस्जिद मामले पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया । सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का फैसला किया है और गोपाल सिंह विशारद को भी रामलला की पूजा करने का अधिकार दिया गया है. हालांकि गोपाल सिंह विशारद का निधन 1986 में हो चुका है. इस तरह से उनके निधन के 33 साल बाद पूजा की अनुमति मिली है।

गोपाल सिंह विशारद वही शख्स हैं, जिन्होंने 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के बाद हिंदू महासभा की ओर से रामलला दर्शन और पूजन के व्यक्तिगत अधिकार के लिए 1950 में फैजाबाद न्यायालय में मुकदमा दायर किया था।

गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में सरकार, जहूर अहमद और अन्य मुसलमानों के खिलाफ मुकदमा दायर कर कहा था कि जन्मभूमिश् पर स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें दर्शन और पूजा के लिए जाने से रोका न जाए. सिविल जज ने उसी दिन यह स्थागनादेश जारी कर दिया, जिसे बाद में मामूली संशोधनों के साथ जिला जज और हाईकोर्ट ने भी अनुमोदित कर दिया।

गोपाल सिंह विशारद का 1986 में देहांत हो चुका है। उनकी मौत के बाद उनके बेटे राजेन्द्र सिंह केस की पैरवी कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि भगवान रामलला विराजमान और अन्य की ओर से दायर अपील राजेंद्र सिंह (गोपाल सिंह विशारद) आदि के खिलाफ थी. हिंदू दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा और अखिल भारतीय श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने भी राजेंद्र सिंह और अन्य के खिलाफ ताल ठोक रखी थी।

गोपाल सिंह विशारद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे पेश हुए थे और बाद में रंजीत सिंह ने बहस की थी। रंजीत कुमार ने कोर्ट में कहा था कि उनका मुवक्किल रामलला का उपासक है और वह मानता है कि जन्मस्थान के मालिक भगवान रामलला ही हैं। वह उपासक है और उसका पूजा का कानूनी अधिकार है जो जारी रहना चाहिए।

अयोध्या विवाद पर शुरुआती चार सिविल मुकदमों में से एक गोपाल सिंह विशारद ने दायर किया था. गोपाल सिंह विशारद अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ला के रहने वाले थे। उन्हें अयोध्या का पहला कारसेवक के रूप में जाना जाता है. वह शुरू से ही हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे।