ऐतिहासिक फैसला…स्वागतम्

चन्द्रकान्त त्रिपाठी

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के दशकों पुराने विवाद में जो तारीखी फैसला दिया है, उसको देश के एक बड़े विवाद के समाधान की सार्थक दिशा के तौर पर देखा जा रहा है। जाहिर है कि इस फैसले का हर किसी को स्वागत करना ही चाहिए। यह किसी से छुपा नहीं है कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद ने देश की गंगा-जमुनी तहजीब को कई मर्तबा गहरी चोटें दी हैं। ऐसे में, इस मामले का स्थाई समाधान जरूरी हो गया था। चूंकि विश्‍व के दूसरे देश विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, ऐसे में कब तक हम विवादों में घिसटते रहते। हर किसी के दिल और मन में इस विवाद के स्थाई समाधान की प्रबल इच्छा थी। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जैसे जन-जन के मन की भावनाओं को और ऐतिहासिक तथ्यों का सूक्ष्म विवेचन कर सर्वमान्य निर्णय सुनाया है। उससे देश को अपनी उच्चतम न्यायिक व्यवस्था पर गर्व है।
इस फैसले से सात दशक पुराने बेहद संवेदनशील मामले की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को सितंबर 2010 में तीन भागों में बांटा, लेकिन इससे सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला संतुष्ट नहीं हुए। इसके बाद सभी तीनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट चले गए थे। कानूनी मामला अयोध्या के 2.77 एकड़ से ज्यादा के जमीन विवाद से जुड़ा हुआ था, जो 1980 से राजनीतिक बहस का मुद्दा बना इसके बाद से यह मुद्दा जब-तब गर्म होता रहा। चुनावी दौर में इस मुद्दे को सियासी दलों ने भुनाने की कोशिश कम नहीं की।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जिन तथ्यों पर फैसला सुनाया है, उनमें पुष्ट ऐतिहासिक साक्ष्य भी हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण यानी आर्केयोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के तत्कालीन महानिदेशक बी बी लाल ने पहली बार राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की विवादित भूमि का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया था, तब उस टीम में के के मुहम्मद भी शामिल थे। यह बात 1976 और 1977 की है। केके मुहम्मद ने विवादित स्थल पर हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण का खुलासा करते हुए कहा था कि वहां से प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले थे। 70 के आखिरी दशक में किए गए इस सर्वेक्षण पर के के मुहम्मद आज भी अडिग हैं। के के मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में निदेशक (उत्तर भारत) के पद से सेवानिवृत हुए। उनको कई प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों को ढूंढने और उनके संरक्षण का श्रेय जाता है। अयोध्या में विवादित भूमि के बहुप्रतीक्षित फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1856-57 में ढांचे के पास हुए दंगों से पहले हिंदू और मुस्लिम सहअस्तित्व के साथ मिलजुल कर रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को दिए अपने फैसले में अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ भूमि हिंदू पक्ष को देकर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के निर्माण के लिए कहीं अन्य जगह पांच एकड़ भूमि देने का फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने भारत के अस्तित्व के समय से चले आ रहे विवाद का समाधान सुनाया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने कहा, विवाद से जुड़ी घटनाएं मुगल साम्राज्य, औपनिवेशिक काल और वर्तमान संवैधानिक शासन से जुड़ी हुई हैं।”शीर्ष अदालत ने पाया कि एक परिसर में दो धर्मो की मान्यताएं थीं। पीठ ने कहा, उनका सहअस्तित्व एक समय, विशेषकर 1856 से पहले स्वीकार्य था। हिंदू और इस्लामिक परंपराओं को अपनाते हुए स्थल की विशेष बात इसे अपनी अलग पहचान देता है। पीठ ने ढहाई गई मस्जिद की धार्मिक और स्थापत्य परंपरा के बारे में बताते हुए कहा, “विवादित स्थल ने विश्वासों और हिंदू, मुस्लिमों की प्रथाओं, विश्वासों और परंपराओं का सह अस्तित्व देखा है।शीर्ष अदालत ने कहा, मंदिर और मस्जिद के गुणों से मिश्रित तत्कालीन ढांचे की धार्मिक और स्थापत्य परंपरा में हिंदू और मुस्लिम तत्वों का मिश्रण दिखता है। भिन्न स्थापत्य तत्व काफी मात्रा में थे, तो उन्हें आसानी से पहचान लिया गया। शीर्ष अदालत ने कहा, वे समकालिक संस्कृति के प्रतीक थे। वराह, गरुड़, जय और विजय के साथ काले कसौटी स्टोन खंबे जैसी विशेष आकृतियों से पता चलता है कि वे शुरुआत में हिंदू मंदिर की सजावट के लिए थे और यहां देवताओं की पूजा होती थी।